पिछोला की प्रेम कहानी

पिछोला की प्रेम कहानी

उदयपुर की शाम हमेशा थोड़ी जादुई होती है, लेकिन उस दिन कुछ अलग था।

पिछोला झील के किनारे सूरज धीरे-धीरे डूब रहा था, और उसकी सुनहरी रोशनी पानी पर ऐसे बिखर रही थी जैसे किसी ने सोने की चादर बिछा दी हो। हवा में हल्की सी ठंडक थी, और दूर से आती बांसुरी की धुन उस पल को और भी खूबसूरत बना रही थी।

काव्या सफेद सूट में झील के किनारे खड़ी थी, उसकी आँखें पानी की लहरों में कुछ ढूंढ रही थीं… या शायद किसी का इंतज़ार कर रही थीं।

“तुम हमेशा यहाँ मिलती हो,” पीछे से आवाज़ आई।

वो मुड़ी—और वहाँ था आर्यन।

नीली शर्ट, हल्की सी मुस्कान, और वही आँखें… जिनमें काव्या ने पहली बार खुद को देखा था।

“और तुम हमेशा लेट आते हो,” काव्या ने थोड़ा सा गुस्सा दिखाते हुए कहा, लेकिन उसकी मुस्कान उसे छुपा नहीं पाई।

आर्यन धीरे-धीरे उसके पास आया, “इंतज़ार का मज़ा भी तो होना चाहिए…”

दोनों साथ-साथ चलने लगे। झील के किनारे, पुराने पत्थरों की गलियों में, जहाँ हर दीवार पर जैसे कोई पुरानी प्रेम कहानी लिखी हो।

“तुम्हें याद है?” आर्यन ने पूछा, “पहली बार यहीं मिले थे… तुम रास्ता भूल गई थी।”

काव्या हँस पड़ी, “मैं रास्ता नहीं, खुद को ढूंढ रही थी… और तुम मिल गए।”

कुछ पल दोनों चुप रहे। हवा ने काव्या के बालों को छुआ, और आर्यन ने धीरे से उन्हें उसके कान के पीछे कर दिया। वो पल इतना करीब था कि जैसे समय भी रुक गया हो।

“काव्या…” उसकी आवाज़ अब थोड़ी गंभीर थी, “अगर मैं कहूँ कि मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ… तो क्या तुम मुझे पूरा करोगी?”

काव्या ने उसकी तरफ देखा—सीधे उसकी आँखों में—
“तुम्हें पता है, आर्यन… मैं हर बार यहाँ इसलिए आती हूँ क्योंकि ये जगह खूबसूरत है… लेकिन अब ये जगह खूबसूरत इसलिए लगती है क्योंकि तुम यहाँ होते हो।”

आर्यन ने उसका हाथ थाम लिया। उसकी उंगलियाँ काव्या की उंगलियों में ऐसे उलझ गईं जैसे वो कभी अलग होना ही नहीं चाहतीं।

उसी वक्त, झील के बीचों-बीच लाइट्स जल उठीं। सिटी पैलेस चमकने लगा, और पूरा उदयपुर जैसे किसी सपने में बदल गया।

“चलो,” आर्यन ने कहा।

“कहाँ?”

“जहाँ हमारी कहानी शुरू हुई थी… उसे हमेशा के लिए यादगार बनाने।”

वो उसे एक छोटी सी नाव तक ले गया। नाव धीरे-धीरे झील के बीच में बढ़ने लगी। चारों तरफ रोशनी, पानी की हल्की लहरें, और ऊपर आसमान में चमकते सितारे।

आर्यन ने जेब से एक छोटा सा डिब्बा निकाला।

काव्या की सांसें थम सी गईं।

“मैंने बहुत जगहें देखी हैं,” आर्यन बोला, “लेकिन सुकून सिर्फ तुम्हारे साथ मिला है… क्या तुम मेरी हर सुबह, हर शाम, और हर उदयपुर बनोगी?”

काव्या की आँखों में आँसू आ गए—खुशी के।

उसने धीरे से कहा, “हाँ… लेकिन एक शर्त पर।”

“क्या?”

“हर साल, इसी दिन… हम यहाँ आएंगे। ताकि हमें याद रहे कि हमारी कहानी कितनी खूबसूरत है।”

आर्यन मुस्कुराया, “डील पक्की।”

और फिर, उसी झील के बीच, सितारों और रोशनी के बीच, उनकी कहानी सिर्फ एक प्यार नहीं रही… वो एक वादा बन गई।

उदयपुर की हवा उस रात थोड़ी और मीठी हो गई थी… क्योंकि उसमें अब दो दिलों की धड़कनें घुल गई थीं।

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Yashraj Mandloi
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